सऊदी प्रेस एजेंसी (एसपीए) की एक रिपोर्ट के अनुसार, सऊदी अरब में महिलाओं की पारंपरिक पोशाकें देश की सांस्कृतिक विरासत का अहम हिस्सा हैं। डिज़ाइन, रंग, कपड़े और कढ़ाई की शैलियों में विविधता हर क्षेत्र की खासियत और वहां के रोजमर्रा जीवन, उत्सवों और शादियों से जुड़ी परंपराओं को दर्शाती है।

मध्य क्षेत्र में "मुनैख़िल" जैसी खुली और चौड़ी आस्तीन वाली पोशाक और "मुशल्लल" जैसी हल्की, सजी हुई पोशाक प्रचलित थी, जिसे आम पोशाक के ऊपर पहना जाता था और जिसके रंग गहरा लाल और काला होते थे। मध्य और उत्तरी क्षेत्रों में "दर्राआ" के कई प्रकार भी मशहूर रहे, जैसे गुलाब के फूलों की कढ़ाई वाली "उम्म वर्दा"।

मक्का क्षेत्र में पोशाकें जीवनशैली और उत्सवों से जुड़ी थीं और उन पर कढ़ाई महिलाओं के हुनर को दिखाती थी। मदीना में "कुर्ता" प्रसिद्ध रहा, जिसमें बड़ी उम्र की महिलाएं हल्के रंग और लड़कियां चमकीले रेशमी रंग पहनती थीं; दुल्हन की "शरआ मदीनी" गहरे गुलाबी रंग की होती थी और सुनहरे धागों से सजाई जाती थी। पूर्वी क्षेत्र में "दर्राआ" और सुनहरे धागों व रेशम से कढ़ा "हाशमी थोब" प्रमुख रहे।

उत्तर में हाइल, अल-जौफ, उत्तरी सीमा और तबूक की पोशाकें स्थानीय परिवेश से जुड़ी थीं, जैसे "मुरौदन", जिसकी तिकोनी आस्तीनें ज़मीन तक जाती थीं। दक्षिण में असीर का काले रेशम से बना "मज़न्नद" सुनहरे और चांदी के धागों से सजता था और आधुनिक डिज़ाइनों के साथ आज भी मौजूद है। जाज़ान में हाथ से कढ़ा "कुर्ता" धारीदार सलवार के साथ पहना जाता था, जबकि नजरान में "मुकम्मम" नाम का लंबा काला चौड़ी आस्तीन वाला थोब सफेद थोब के ऊपर पहना जाता था।

रेशम, सूती और ऊनी कपड़ों से लेकर सुनहरे-चांदी के धागों और मोतियों तक, ये पोशाकें कपड़ा चुनने, रंगों के मेल, सिलाई और कढ़ाई के पीढ़ियों पुराने ज्ञान को संजोए हुए हैं और अपने परिवेश व अवसर से जुड़ाव दिखाती हैं।