सऊदी अंतरराष्ट्रीय बाज़ और शिकार प्रदर्शनी 2026 में सऊदी शिल्पकार लहदा अल-अनज़ी, जो ‘उम्म अल-सदू’ के नाम से जानी जाती हैं, सदू बुनाई के अपने 60 वर्षों से अधिक के अनुभव को आगंतुकों के सामने पेश कर रही हैं। वे अपने काम के नमूने दिखाने के साथ हाथ से बुनाई के चरणों, उत्पादों और सऊदी विरासत से उनके जुड़ाव के बारे में बताती हैं।
हिजरी वर्ष 1371 में जन्मी अल-अनज़ी ने 13 साल की उम्र में यह शिल्प शुरू किया और छह दशकों से अधिक समय से इसकी पारंपरिक कला को संजोए हुए हैं। उन्होंने लगभग 46 महिलाओं को हाथ से बुनाई और सदू की पारंपरिक तकनीकों का प्रशिक्षण दिया है।
उन्होंने बताया कि सदू में ऊन के धागों को तैयार कर रंगा जाता है और फिर करघे पर हाथ से बुनकर ज्यामितीय डिज़ाइन व तरह-तरह की आकृतियां बनाई जाती हैं। पुराने समय में यह शिल्प बद्दू (बेदुइन) जीवन से जुड़ा था और रोज़मर्रा की कई ज़रूरतों के साथ घरों व बैठकों का सामान इसी से बनता था।
उनके उत्पादों में थैले, बैठकों में इस्तेमाल होने वाले ‘सफ़ाइफ़’, ऊंटों का साज़ो-सामान जैसे खुर्जी, लगाम, रस्सी और ऊंटनियों के हार, घोड़ों के कुछ सामान, कंगन, की-चेन, घरेलू सजावटी लटकन और बालों से बने पारंपरिक तंबुओं में लगने वाले सदू के टुकड़े शामिल हैं।
लाइव प्रदर्शन के दौरान आगंतुक देखते हैं कि करघे पर धागे कैसे गुज़ारे जाते हैं और डिज़ाइन व रंग कैसे उभरते हैं। अल-अनज़ी कहती हैं कि सदू सऊदी विरासत का मूल हिस्सा है और इसे बचाए रखने के लिए इसका हुनर नई पीढ़ियों तक पहुंचाना ज़रूरी है। ये प्रदर्शन उन पारंपरिक शिल्पों में शामिल हैं जिनसे प्रदर्शनी आगंतुकों को परिचित करा रही है।


