सऊदी अरब के नजरान क्षेत्र में पुराने मिट्टी के घरों और महलों के लकड़ी के दरवाज़े आज भी कारीगरों के कौशल और लोक वास्तुकला की विशेषताओं को सहेजे हुए हैं। इन्हें बनाते और सजाते समय सुरक्षा, निजता और सुंदरता तीनों का ध्यान रखा गया, और विरासत इमारतों में बचे इनके नमूने यहाँ के लोगों के जीवन और शिल्प के साक्षी हैं।

ये दरवाज़े प्रवेश द्वार की जगह और उपयोग के अनुसार एक या दो पल्लों वाले, बड़े या छोटे होते हैं। कहीं खड़े तख़्तों को आड़ी पट्टियों से जोड़ा गया है तो कहीं फ्रेम के भीतर आड़ी पट्टियाँ लगी हैं। इन पर त्रिकोण, समचतुर्भुज, वृत्त और मेहराब जैसे ज्यामितीय और वानस्पतिक अलंकरण, धातु के हिस्से और कभी-कभी मालिकों से जुड़े लेख या तारीख़ें भी मिलती हैं।

नजरान की पुरातत्व और इतिहास सोसाइटी “जातन” के बोर्ड अध्यक्ष मोहम्मद आल हुतैला के अनुसार बड़े और भारी दरवाज़े सुरक्षा तथा पशुओं और फ़सल को भीतर लाने के लिए थे, जबकि छोटे दरवाज़े भीतरी प्रवेश और कमरों के लिए। उन्होंने खटखटाने वाले “क़रआ”, कुंडी, चाबी और “सुकरा” जैसे हिस्सों का उल्लेख किया और कहा कि बचे हुए पुराने दरवाज़े बढ़ईगीरी, सजावट और ताला-प्रणाली के दस्तावेज़ी मूल्य रखते हैं।

नजरान विश्वविद्यालय में वास्तुकला के सहायक प्रोफ़ेसर डॉ. ख़ालिद बिन अली अल-मज़्ज़म ने बताया कि यह शिल्प पीढ़ियों से चली आ रही कारीगरों की दक्षता और सिद्र व असल (झाऊ) जैसी स्थानीय लकड़ियों पर टिका था, जो मज़बूत और मौसम झेलने में सक्षम हैं। लकड़ी चुनकर तख़्ते चीरे जाते, उन्हें आड़ी पट्टियों से जोड़ा जाता, फिर नक्काशी कर हत्थे और ताले लगाकर दरवाज़ा दीवार में जड़ा जाता। मुख्य दरवाज़े में छोटा द्वार भी होता था, जिससे पूरा दरवाज़ा खोले बिना आना-जाना हो सके।

नमी, बारिश, तापमान में उतार-चढ़ाव, कीड़े, उपेक्षा, ग़लत मरम्मत और आधुनिक सामग्री से बदलाव इन दरवाज़ों के अस्तित्व के लिए ख़तरा हैं। इसलिए दोनों विशेषज्ञों ने इनके दस्तावेज़ीकरण, उचित रखरखाव और मरम्मत, पारंपरिक बढ़ई कारीगरों के समर्थन और उनका ज्ञान नई पीढ़ी तक पहुँचाने की अपील की।